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Best motivational thoughts -Nazar na lage mere laal ko .

motivational thought

जब कोई माँ ममता और स्नेह से ओटप्रोट होकर नज़र न लगे मेरे लाल को गाती हुई अपने मासूम से कलेजे के टुकड़े के माथे पर एक छोटी सी काली बिंदी लगा देती है| तो देखने वाले के मन में एक पवित्र सी ममता की भावना हिलोरे मारने लगती है | पर यही स्नेह जब अतिसयोंक्ति बन जाता है तो एक माँ कैसी कैसी हरकते करने लगती है | अपने लाल को पराई नज़रों से बचाने के लिए आज के आधुनिक युग में भी अपने भारतीय समाज में जाने कितने अंधविश्वास सिर्फ बच्चों को नज़र लगने के संबंध में भरे पड़े हैं | अपने आस पास हम झांक कर देखेंगे तो पाएंगे कि प्राय अधिकांश घरों में नवजात बच्चों को बाहर की हवा भी नहीं लगने दी जाती | सिर्फ इस डर से कि कोई उसे देख लेगा तो बच्चा बुरी नज़र का शिकार हो जायेगा | अगर बच्चा किसी कारण वश दूध न पिये तो शुरू से याद किया जायेगा कि आज घर में कौन कौन आया था और फिर उसे जी भर कर कोसने के साथ साथ दुनिया भर के टोन टोटके उस बच्चे पर किये जायेंगे | अभी मैं अपने किसी परिचित के यहाँ गयी थी उनका एक साल का बच्चा उस दिन संयोग से दूध नहीं पी रहा था | बच्चे की माँ बी.ऐ की डिग्री हासिल करके भी यही सोच रही थी कि हो न हो मेरे बच्चे को आज किसी की नज़र लगी है फिर उसने सात मिर्ची लेकर बच्चे के ऊपर से वार कर चूल्ल्हे में डाल दी | मेरा तो खांसी के मारे बुरा हाल हो गया | मुझे तो पूरा विश्वास था कि बच्चे का अभी मूड नहीं होगा | बच्चे कुछ कह तो सकते नहीं सिर्फ इनकार ही कर सकते हैं | मुझे विश्वास था कि थोड़ी देर बाद भूख लगने पर बच्चा स्वयं ही दूध पी लेगा | हुआ भी ऐसा ही पर उस परिवार ने तो इसे टोटके का ही परिणाम माना |

सोचने की बात है कि नमक मिर्ची जलाने से कभी नज़र उतरा करती है? और फिर नज़र लगती ही कहाँ है जो उतरेगी | किसी वस्तु को कोई देख लेगा तो वो ख़राब हो जाएगी| किसी बच्चे को कोइ देख लेगा तो वो बीमार हो जायेगा | भला इन बातों में क्या तुक है ? पता नहीं इतना पढलिख कर भी आज की युवा पीढ़ी कैसे इन कोरी बकवास पर विश्वास किये बैठी है | मुझे तो लगता है नज़र बच्चों को नहीं उनके दिमाग को ही लग गयी है | तभी तो वे ऐसी बेतुकी बातें सोचते हैं | यह नज़र का मामला यहीं तक सीमित होता तो सहनीय था | पर इसमें न जाने कितने होनहार बच्चों को असमय ही काल का ग्रास बना दिया | कितने ही घरों में बच्चों के बीमार पड़ने पर उसे बुरी नज़र का शिकार समझ कर डॉक्टर को न दिखा कर , झाड़ा टोना करने वालों की शरण में ड़ाल दिया जाता है | ये झाडा लगाने वाले मंदिर के पुजारी या ओझा अपना पूरा दाम वसूल कर टोना टोटका कर कर चले जाते हैं | संयोग से बच्चा बच जाये तो पुजारी का प्रताप समझा जाता है और न बचे तो घरवाले रो धो कर यही संतोष करते हैं कि बच्चे को बहुत कड़ी नज़र लगी थी जो अपने साथ उसे भी ले गयी | यह कोई नहीं सोचता कि बीमार बच्चे को तो डॉक्टर ही ठीक कर सकता है ओझा नहीं | अगर इन ओझा और पुजारी में इतनी ही ताकत होती तो फिर डॉक्टर बनने की किसी को आवश्यकता ही क्या थी | पता नहीं कब हमारा समाज इस बात को गहराई से लेना कब सीखेगा | छोटी छोटी बातों के तह में जाके सोचे तो हम कितनी ही बरबादियों को बचा सकते हैं | मेरे एक पडोसी की बात बताऊ वहां छोटे बच्चों को अच्छे कपडे भी नहीं पहनाये जाते क्यूंकि उन्हें डर रहता है कि मेरा बच्चा अधीक सुन्दर दिखेगा तो उन्हें कोई नज़र लगा देगा भला ये कोई बात हुई | इन्ही बातों का परिणाम है कि कितने ही आँगन जो बच्चे की किलकारियों से गूंजते होने चाहिए थे असमय ही सूने होते जाते हैं |

धय्न्यवाद

सुधा गोएल .

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