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Boredom is the root cause of depression

बोर बोर बोर – जहाँ देखो जिससे भी सुनो बोरियत शब्द प्राय सबके मुंह में सुनने में आ रहा है | में और मेरे तीन चार दोस्त रोज़ सुबह टहलने को चले जातें हैं | कल जब वाक करने के बाद रेस्ट करने के लिए बैठ गए तो मेरी एक दोस्त बोली | यार करने को कुछ है ही नहीं | दिन भर बड़ा बोर हो जाते हैं | दूसरी दोस्त तभी बोलिल ” हाँ , यार अभी तो कोरोना के चलते कहीं जा आ भी नहीं सकते | घर में पड़े पड़े बड़ा बोर मार रहा है” | सभी के मूह से यह सुनकर मुझे बड़ा अजीब लगा | में सोचने लगी यार मुझे तो समय ही नहीं मिल रहा कुछ करना चाहकर भी नहीं कर पा रही | कुछ सोचते हुए मैंने उनसे कहा ” कल तुम सब मेरे घर पर आ जाओ | कुछ समय साथ में गुजारेंगे | दुसरे दिन वो सब घर पर आ गयी |मेरे पोता पोती उनके आते ही दोनों आंटी ओटी कहके उनके गोद में चढ़ गए और बातें करने लगे अपनी तोतली जुबान में | उनको भी बहुत अच्छा लग रहा था सब बहुत खुश हो रही थी | मुझसे कहने लगी ” यार तू तोह बहुत लकी है ” | इतने प्यारे प्यारे बच्चों के साथ समय व्यतीत कर रही है | में मुस्कुराने लगी तभी हमारे पोदोसी का बच्चा जो दस बारह साल का रहा होगा आया | जिसे मैंने ही बुलाया , मैंने उसे कहा बेटा क्या कर रहे थे ? उसने बोला पढाई करने के बाद थोडा माँ के साथ उनकी मदद कर रहा था |

मैंने कहा क्या तुम कभी बोरियत महसूस करते हो ? नहीं आंटी ! पहले बहुत बोर होता था | लेकिन अब नहीं | अच्छा ! कैसे बताओ ? मैंने अपने दोस्तों को कहा ” सुनो ऐसा हुआ था “| माँ – ” बेटा खाना रखा हुआ है खालो “| बेटा – ” नहीं , माँ में नहीं खाऊंगा “| बहुत बोर लग रहा है |

माँ घबराते हुए किचन में से आई ” बेटा क्या लग रहा है तुझे ? मुझे दिखा ? मुझे बता” | बीटा बोला ” माँ , मुझे बोर लग रहा है “| बेटा वो क्या होता है ? और तुझे क्यूँ लग रहा है ?बीटा ” माँ , मेरा टाइम पास नहीं हो रहा है || में खली बैठा हूँ तो मुझे अच्छा नहीं लग रहा है | उसे ही बोर लगना कहते हैं माँ | ओ बेटा में तो डर गयी थी | अच्छा बेटा तू जल्दी से खाना खा ले| फिर में कुछ करती हूँ | तेरे पास कुछ है क्या माँ ?? तू क्या करेगी | बेटा ऐसा कर मुझे तो रसोई के काम से फुर्सत ही नहीं मिल पा रहा है , कबसे पूरा घर गन्दा हो रहा है | अगर तू थोड़ी मदद कर दे तो | ना माँ मुझसे ये सब नहीं होगा | मुझे नहीं अच्छा लगता लेकिन तू कह रही है तो ठीक है चल करवा देता हूँ | दुसरे दिन ऐसे ही माँ ने रसोई घर में बुला लिया | बेटे ने पुरे मदद की | फिर तीसरे दिन माँ ने कहा -” तेरी किताबें तू कह रहा था की मिल नहीं रहीं है | जरा एक बार पूरी अलमारी देख ले | और ठीक से सजा भी ले | देखो मिल जाये तो | चौथे दिन माँ ने कहा -” बेटा , लगे हाथ तेरे कपडे की अलमारी भी ठीक कर ले “

आंटी अब ऐसा करते करते मुझे आदत हो गयी है | अब में खली बैठ ही नहीं पाता , कुछ न कुछ काम धुंद के कर ही लेता हूँ | सभी मेरी दोस्त उसकी बातें आश्चर्य से सुन रही थी | फिर पास ही एक बुजुर्ग महिला रहती है |में मेरी दोस्तों को लेकर उनके पास गयी | उन्होंने हमे बड़े प्रेम से अन्दर बुलाया | मैंने उनसे कहा ” आंटी ये सब मेरी दोस्त है , में इन्हें आपसे मिलवाने लेकर आई हूँ “| तो वो बहुत खुश हुई | आंटी आप इन्हें अपने बारे में बताईये | तो वो मुस्कराने लगी और उन्होंने बताया कि कैसे उनहोंने अपने जीवन की हिकता को भरने के लिए ये सब शुरू किया | आंटी ने बताया कि अपने आस पास वो देखती थी कि महिलायें अपने छोटे छोटे बच्चों को छोड़कर , आया को सौंप कर मौज मस्ती जैसे किटी पार्टी, तम्बोला पार्टी और ना जाने कभी शौपिंग के बहाने , कभी मन में मन नहीं लग रहा कहकर दोस्तों के साथ इधर उधर निकल जाती है | और वो आया लोग बच्चों को रोता छोड़कर फ़ोन पे बातें किया करती है | आस पास की आया को बुलाकर मीटिंग किया करती है | बच्चों की उन्हें कोई फिकर नहीं होती | यह सब देखकर मुझे बहुत तकलीफ होती थी और मैंने अपना खाली समय को व्यतीत करने का उपाय ढून्ढ निकाला | आस पास की सभी महिलाओं को बुलाया | और उनसे ये सब बातें की |क्या करे आंटी घर पर बोर हो जातें हैं हम सब | तब मैंने कहा तुम्हारे बच्चों को आया क्या संस्कार दे रही है | तुम्हे पता है कुछ ? उनकी आदतें ही बच्चे सीखेंगे | उनके तोर तरीको का बच्चों पे क्या असर होगा वो तुमने कभी सोचा भी नहीं होगा | वो सब बोली ” हम क्या करें आप ही बताएं | तब आंटी ने उनसे कहा ” तुम सब अपने बच्चों को यहाँ मेरे पास छोड़ दो लेकिन एक शर्त है तुमलोगों को भी इधर आना पड़ेगा | आंटी हम क्या करेंगे यहाँ पर ? अरे हम सब मिलकर बच्चे के साथ समय व्यतीत करेंगे |हम उन्हें सिखायेंगे , संस्कार देंगे | हमारे बच्चों को कोई और क्या संस्कार देगा | हमे अपना बच्चा कैसा तैयार करना है ये हमसे बेहतर कौन जान सकता है ? और इस तरह आंटी का घर एक प्ले स्कूल में बदल गया | जहाँ माता ही शिक्षक थी | माता ही दोस्त थी | उनको भी यह सब करना बहुत अच्छा लगने लगा | वो आंटी को सो सो धन्यवाद देने लगे | उनकी नज़रों के सामने बच्चों बड़े हो रहे थे | रोते हुए बच्चे अब हसी ख़ुशी बड़े हो रहे थे | सब बहुत खुश थी | दूर दराज से भी माएं अपने बच्चों को लेके आने लगी | तो देखा आपने !! करने के लिए बहुत कुछ है | हम खली बैठकर बोर बोर करतें हैं | इधर उधर समय व्यतीत ना करके यदि कुछ भी छोटा मोटा काम ढूँढकर सुख का जीवन व्यतीत कर सकते हैं | तो हमे भी अच्छा लगेगा और हमारा भी मन खुश रहेगा ?

मंजू मधोगारिया

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