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Haan main chor hoon( aatma katha)

बचपन से पढ़ते और सुनते आ रहें हैं ‘चोरी करना पाप है ‘, ‘चोरी नहीं करनी चाहिए ” लेकिन कभी कभी मज़बूरीवस् भी यह काम करना पड जाता है |जैसे किसी की जान बचने के लिए बोला गया झूट , झूट नहीं कहलाता |वैसे ही कभी कभी हालात इंसान को मजबूर कर देतें है चोरी करने के लिए | कभी कभी इंसान स्वार्थ के बस मैं होकर चोरी करता है |कभी बडे बडे ख्वाबों को पूरा करने के लिए चोरी करता है |हाल ही मैं मेरी एक चोर से मुलाक़ात हुई | उस चोर की आप्ब्यातु मैंने सुनी तो यह चोर की आत्मकथा लिखने की मेरी इच्छा प्रबल हुई और मैं आप सब से भी वह बांटना चाहती हूँ |एक दस साल का बच्चा बदले की भावना से चोर बन जाता है और गर्व के साथ कहता है कि “मैं चोर हूँ “|तो कितना आश्चर्य होता है लेकिन मुझे आश्चर्य नहीं उस चोर के साथ सहानुभूति हुई | रवि आज एक पक्का चोर बन चूका है | उसने बताया वह जब दस साल का था और अपनी माँ के साथ रहते हुए , ख़ुशी ख़ुशी रह रहा था | पिताजी को तो वह बचपन मैं ही खो चूका था | अपनी माँ को ही वह अपनी दुनिया मानता था | मेरी माँ ने हर तकलीफ का सामना करते हुए मुझे पाला पोसा |हर वोह चीज़ जो मुझे चाहिए थी मुझे ला के दी |पर मेरे भाग्य में शायद विधाता ने यह सब कुछ ही दिनों के लिए ही लिखा था |मेरी माँ को टी.व् की बीमारी ने घेर लिया | वह जिस सेठ के यहाँ खाना बनाने का काम करती थी | उन लोगों ने उसे काम से हटा दिया | मेरी माँ ने बहुत मिन्नतें करके अपनी जगह मुझे वहां लगा दिया | मैं भी ख़ुशी से मन लगाकर मुझे जो भी काम दिया जाता था मैं सब करने लगा | इस तरह माँ के दवा पानी के लिए कुछ पैसों का इंतज़ाम हो जाता था | लेकिन इतने से भी माँ ठीक नहीं हो रही थी बल्कि माँ की बीमारी बढ़ते ही चली गयी |डॉक्टर को दिखाया उनहोंने इंजेक्शन और दूसरी दवाओं की लिस्ट मुझे थमाई और कहा जल्द से जल्द लेकर आओ तब शायद कुछ हो सके | उन सब की किम्मत दस हजार रूपय थी | मैं इतने रूपए का इंतज़ाम कैसे कर पाता | मुझे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था | तब मैं सेठ जी के पास गया और साड़ी बात बताते हुए वोह पैसे मांगे और कहा मैं तो काम कर ही रहा हूँ सेठजी आप मेरे तनख्वाह मैं से काटते रहिये | लेकिन जब माँ ठीक हो जाएगी मैं आपके पैसे चूका दूंगा | मुझे एक बार पैसे दे दीजिये लेकिन कहावाट है ना “जाके पैर ना फटे बेवाई , वो क्या जाने पीर पराई | वही हुए सेठजी ने मना कर दिया कहा ” हम एक साथ तुम्हे इतना पैसा नहीं दे सकते | तुम काम कर रहे हो , पगार तुम्हे मिल रही है ना ? रवि ने बहुत कहा ” सेठजी , माँ ने आप सब की बहूत सेवा की है , मैं सब चूका दूंगा , बस मेरी माँ अची हो जाये” |उसकी सभी बातों को अनसुना कर दिया सेठ जी ने और साफ़ इनकार कर दिया | इलाज नहीं हो पाया | कुछ समय बाद उसकी माँ चल बसी | रवि दुःख से पगा हो गया |

तभी वहां से उसके मन में बदले की भावना जागी |उसने सोचा सेठ के कारन मुझे मेरी माँ छोड़ के चली गयी | इस सेठ को भी मैं सबक सिखाऊंगा | मैंने सेठ की हर वो किम्मति चीज़े उठानी शुरू कर दी और उन्हें बाज़ार मैं बेचना शुरू कर दिया | मेरे ऊपर शुरू शुरू मैं तो किसी ने भी सक नहीं किया क्यूंकि मेरी इमानदारी का उन्हें विश्वास था | लेकिन छोटी मोती चोरी से मेरा मन नहीं भरा और मैंने बड़े हाथ मारना शुरू किया | तब उन लोगों को थोडा थोडा शक मुझपर होने लगा | तब मैंने अपने साथी के साथ मिलकर एकबार रात को रुपया ,पैसा, गहने , सोना और चांदी जो भी हाथ लगा मैंने चुराया और यह काम मैंने एक साथी की सहायता से किया | और हमने वो शेहेर ही छोड़ दिया |

हां से बहुत दूर एक शेहेर मैं भाग खड़े हुए |लेकिन मैं चोरी करता जरूर था लेकिन मैंने कुछ सिद्धांत भी बनाये हुए थे |मैं चोरी का सामान बेचकर जो भी पैसे मुझे मिलते थे , मैं उन्हें हमेशा जरूरतमंद की सहायता के लिए खर्च करता था | अंतिम चोरी जो हमने की उससे हम बहुत दूर एक छोटे से गाँव मैं जाकर हमने एक अनाथ आश्रम खोला | और कुछ बच्चों को जिनका कोई सहारा नहीं था हम उनका सहारा बने | हमने उनको पाला | मैंने अपने जीवन मैं आई कमी को उन बच्चों को ख़ुशी देकर पूरी कर ली | उसने बताया कि वह अभी भी अपने साथियों के साथ मिलकर चोरी करवाता है और उस पैसे को भलाई के काम मैं लगता है | गरीब परिवारों की मदद करता है | गरीब बच्चों को पढने लिखने मैं मदद करता है |तो यह है रवि की कहानी , जिसको बदले की भावना ने चोर तो बना दिया लेकिन उसने फिर व्ही अपने संस्कार अपनी अच्छाई नहीं छोड़ी और अपने जीवन को दूसरों की भलाई में लगाकर सार्थक किया | और गर्व के साथ वह सबको कहता था कि” हाँ मैं चोर हूँ “|

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