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khushi kahan hai ? kya aap jaante hai ? chalo dhundte hain .

khushi kahan hai?
जिस परिस्तिथि को मन स्वीकार कर ले वही सुख है, ख़ुशी है | ख़ुशी तो चारों और बिखरी हुई है बस उसे महसूस करने का हमारा नजरिया हमारा अपना होता है |हम अपने सोच के द्वारा हालात को चाहे तो ख़ुशी में बदल देते हैं या फिर उसकी को दुःख में बदल लेते है | एक बार मुझे किसी के यहाँ भोजन पे आने का निमंत्रण मिला | मेरी तबियत उस दिन कुछ ठीक नहीं थी | तो मैंने अपने दोनों भाइयों को वहां भेज दिया |खाना खा क्र दोनों वापस आये एक तो बहुत खुश था और दूसरा उदास | मैंने पुछा क्या बात है ? खाना अच्छा नहीं था ?या फिर तुमलोगों को वहां मान सम्मान नहीं मिला ? बताओ क्या बात है ?जो खुश था वो बोला -” नहीं नहीं खाना तो बहुत अच था , मैं तो सोच के गया था कि वो लोग तो बहुत कंजूस हैं कुछ मिलने वाला नहीं है | पर उन्होंने लौटते समय मुझे पांच रूपए दिए | मैं तो पैसे पाकर बहुत खुश हुआ |दूसरा जो उदास था उससे पुचा गया | उसने बताया कि मैं तो सोच के गया था कि वो तो बहुत पैसे वाले लोग हैं | बहुत कुछ मिलेगा वहां लेकिन उन्होंने मुझे पांच रूपए पकड़ा दिए . मुझे अच नहीं लगा | अब देखिये मन की स्थिति ने दुःख और सुख का अनुभव कैसे करा दिया |

असल मैं दुःख है न सुख यह तो स्वयं पे निर्भर है कि माहोल जो खुशनुमा हम कैसे बना देते हैं | एक बार मेरी एक बहुत पुराणी दोस्त का मेरे पास बहुत दिनों बाद फ़ोन आया | वो बोलने लगी आजकल बहुत परेशान हूँ , बहुत दुखी हूँ , मैंने पुचा ऐसा क्यूँ ? उसने कहा मालूम नहीं |तब मैंने उसे अपने घर आने का निमंत्रण दिया | दुसरे दिन वो आई | मैं उसे लेकर बाजार गयी | हमने रास्ते मैं बहुत सी बातें भी की | बाजार पहुँचते ही मैंने देखा की एक बूढी औरत दोनों हाथों मैं थैला लिए रास्ता पार करना छह रही थी पर कर नहीं पा रही थी |और उसने अपने दोस्त को कहा तुम रुको मैं अभी आई | और जल्दी से उस औरत के पास गयी और उनके हाथ से थैले लिए और सड़क पार पहुँचाया | बूढी औरत का हाथ मेरे सर पे था और बहुत से आशीष वचन उन्होंने कहे वो बहुत खुश थी उनकी ख़ुशी से हमे बहुत ख़ुशी मिली | हमने कुछ खरीदारी की और अपने घर के ताराफ लौटने लगे | मैंने अपने दोस्त को कहा चलो आज दिन भर कहीं घूमेंगे , फिरेंगे , सिनेमा देखेंगे और दिन भर मजे करेंगे | उसने कहाँ अच है चलेंगे | हम घर पहुंचे सामने दादाजी बैठे मिले | दादाजी ने मुझे आवाज़ दी – बोले बेटा राखी आ मेरे पास भी थोड़ी देर बैठ |

मैंने कहा हाँ दादाजी अभी आई और दादाजी के साथ बैठ कर हमने खूब खेला , लूडो खेला और खुब्सारी बातें की | दादाजी ने अपने पुरानी पुरानी बातों से हमारा मनोरंजन किया | मेरी दोस्त के तो हस्ते हस्ते पेट मैं बल पद गए वो बहुत खुश थी | इतने मैं मेरे भाई के बच्चे दौड़ते हुए आये , बुआ बुआ हमारे साथ खेलने चलो | हमने बहुत सारे खेल खेले , कभी क्रिकेट , आँखमीचोली आदि |बच्चे बहुत खुश हुए | इतने में हमारी पदोसन चची आई | राखी मुझे बहुत जरूरी है , तू बाज़ार जाकर मुझे कुछ सामन लाकर दे दे मेहमान आयेंगे | मैंने कहां हाँ चची अभी लाती हूँ |

मेरे दोस्त को मैंने बच्चों मैं व्यस्त करके जल्दी जल्दी सारा सामान लाकर दे दिया | पड़ोसन चची बहुत खुश हुई | और कितनी बार धन्यवाद किया |मेरी दोस्त ये सब देखकर बोली | राखी तू तो बहुत खुश नसीब है , सब तुझे कितना चाहते हैं | पर ये सब तू क्यूँ करती है ? तेरे अपने शौख तेरी अपनी इच्छाएं तू दूसरों पे ही न्योंचावर कर देती है | तेरा अपना मन मेरे साथ घुमने जाने का था पर तूने उसे महत्व न देकर सबको ख़ुशी दी पर मैंने कहा ” दूसरों को ख़ुशी देकर जो ख़ुशी हमे मिलती है वो अपने अकेले के शौख पूरा करने की ख़ुशी से कई गुना ज्यादा है | बाजार मैं ख़ुशी मिली , घर परिवार मैं ख़ुशी मिली , समाज में ख़ुशी मिली तो ख़ुशी को पाना न पाना वह हमारे स्वयम के अन्दर है | हम अकेले एक खुश होने से अच्छा है हम अपने द्वारा कितने ही लोगों को ख़ुशी दे रहें है | खुशियाँ लेने कहीं जाने की जरूरत नहीं है , खुशियाँ तो हमारे आस पास हमारे अपने ही लोग हमे देते हैं | पर हमको सही तरीका मालूम होना चाहिए थोडा सा त्याग करने से ढेरो खुशियाँ हम अपने आस पास ही ढून्ढ लेते हैं |मेरी दोस्त यह सब देखकर धन्यवाद देते हुए बोली तुझे नहीं पता तूने मुझे क्या सिखाया है क्या दिया है |

धन्यवाद

मंजू मधोगारिया .,

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