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Meri lado ki kahani ( an article on daughter)

lado ki kahani

बेटी बन दुनिया में आई | मात पिता की लड़ो कहलाई |और ये लड़ो कब पराया धन बन जाती है पता ही नहीं चलता | होश सँभालते ही स्चूली शिक्षा के साथ एक क्लास घर में भी चलती रहती है | बेटी तो पराया धन होती है | बेटी का उठना बैठना ऐसा होना चाहिए | बेटी का हसना बोलना , खाना पीना ऐसे होना चाहिए | ससुराल में जाकर क्या नाक कटाएगी | अब ये लड़ो कैसे समझेगी की उसके कारन घरवालों की नाक कैसे कट जायेगी ? यही सब सुनते सुनाते लाडो बड़ी हो जाती है | अब उसे खाना बनाने , घर सँभालने की सिक्षा मिलनी शुरू हो जाती है | सारा दिन सहेलियों और मोबाइल में मत चिपका करो | ये सब ससुराल में नहीं चलेगा | वहां ढंग से रहना होगा सबका कहना मानना होगा | ससुराल न हुआ, हउआ हो गया | बिचारी लड़ो शादी के नाम पर सहेम सहेम जाती है | ससुराल में सब उसे स्वीकार करेंगे की नहीं ? अगर वहां प्यार न मिला तो वह क्या करेगी यही सब पहेलियाँ बुझते- बुझते उसकी शादी हो जाती है | ससुराल में नए रिश्तों का सामना होता है | सास, सुसुर , पति ननद , जेठ , देवर आदि के बीच अपना तन ढूँढ़ते ढूँढ़ते कुछ समय बीत जाता है |

फिर शुरू होते हैं गृहस्ती ,रसोई के काम काज| सबकी फरमाइशे पूरी करना और सबका हुम्कुम बजाना इनमे उलझते करते कब वह लड़ो से माँ बन जाती है | अब आती है बच्चों की जिम्मेदारियां | बच्चों को पालते पोसते , पढ़ते लिखते , कब उम्र बीत जाती है पता ही नहीं चलता |

खुद के लिए भी कुछ सोचना है , यह सोचने के लिए तो वक़्त ही नहीं मिलताकरती अनजान और दिल में एक आवाज़ गूंजती है

” सबकी होते होते , खुद की नहीं हो पाती में |

रिश्तों को ढ़ोते – ढ़ोते टुकडो में बटती जाती में “|

खुद को तलाश करती ,अनजान भावर में खोती जाती मैं |”

सुधा गोएल

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