MOTIVATIONAL THOUGHTS

Naseeb apna apna

नसीब अपना अपना

नसीब अपना अपना यह विषय है हमारे और आपके बीच कुछ विचार साझा करने का |नसीब तोह सभी का अपना अलग ही होता है | किसी के नसीब मैं सुख ज्यादा और किसी के नसीब मैं दुःख अधीक होता है \ यह तोह कर्म सिद्धांत पर निर्भर होता है| कर्मो के अनुसार ही हमारा नसीब बनता है| जो हमारे किस्मत मई लिखा होता है, वही हमे जिंदगी मैं मिलता है |लेकिन अपने पुरुषार्थ और मेहनत से हम अपनी किस्मत को बदल भी सकते है | सही सोच और सच्ची लगन से हम अपनी ज़िन्दगी मैं खुशिया ला सकते हैं |

नसीब अपना अपना

आइये अब हम देखते हैं कि दो सहेलियां राजनि और रेखा की जिंदगी मैं क्या हुआ | रजनी और रेखा बचपन से ही पक्की सहेलियां थी| दोनों साथ साथ खेलते , कूदते , पढ़ते लिखते बड़ी हुई | दोनों के बड़े होने पर उनके माँ- बाप ने उनकी शादी करदी |अलग अलग शहरों मैं दोनों की शादी शुदा जिंदगी शुरू हुई | रजनी तोह शादी से खुश, थी लेकिंन रेखा के नसीब मैं ख़ुशी नहीं थी | कुछ दिन तोह ठीक ठाक गुजरे फिर उसकी सास ने उलाहना देना शुरू कर दिया | पते की आस मैं सास ने रेखा पर दबाव डालना शुरू कर दिया | नसीब मैं तोह लड़का नहीं लड़की लिखी थी | रेखा को दो बेटियाँ हो गयी | बड़ी लडकी शगुन और छोटी बेटी श्वेता | पर दादी तोह दोनों को अब्शगुण ही समझती थी | कभी ऊन्हे गोद मैं नहि लिया बल्कि नफरत से ही देखती थी | रेखा हैरान थी की आज भी ऐसी सोच रखते हैं | सास रेखा पर पोते के लिये फिर से दबाव डालने लगी | घर की आर्थिक स्थिथि भी अच्छी नहीं थी ,ऊपर से हर समय सास की कलह | तंग आकर रेखा ने एक महत्वपूर्ण फैसला लिया | एक और बच्चे की जिम्मेदारी वह नहीं उठा सकती थी | इसीलिए अपनी दोनों बेटीयों का भविष्य सवारने का निर्णय लिया | बेटियों को अच्छी शिक्षा और संस्कार दिए | पढ़ा लिखा कर उन्हें इतना काबिल बना दिया की उनपर गर्व किया जा सके | शगुन अप एक नेत्र विशेषज्ञ बन चुकी थी | और श्वेता सॉफ्टवेर इंजिनियर | दोनों अच्चा कमाने लगी | रेखा की अथक मेहनत रंग लायी | पर तभी दादी बीमार हो गयी | उनकी आँखों से दिखना कम होने लगा | अब वह अपना काम भी खुद नहीं कर पाती थी | ऐसे समय मैं दोनों पोतीयाँ दादी की सेवा मैं लग गयी |

शगुन ने दादी की आँखों की जाच की और अपने अस्पताल मैं अच्छे से अच्छा इलाज किया और कुछ ही दिनों मैं दादी की आँखें ठीक हो गयी | श्वेता ने दादी की खूब सेवा की | दोनों की रात दिन की मेहनत रंग लायी | अभ दादी जो अपनी भूल का एहसास हुआ | शगुन और श्वेता अब दादी की आँखों का तारा बन चुकी थी | इस प्रकार रेखा ने अपनी मेहनत और सच्ची लगन से अपना नसीब चमका लिया | जिस नसीब ने रेखा को इतने दर्द भरे दिन दिखाए थे , अब वाही नसीब रेखा पर बहुत मेहरबान था | रेखा ने फिर पीछे मुड कर नहीं देखा और पूरी ज़िन्दगी सुख से बित्याई| सच है तकदीर को बदलना हमारे ही हाथ मैं है | कहा भी गया है – हिम्मते मर्दा मद्दे खुद्दा |

(2) Comments

  1. […] इश्वर तो हमारे अन्दर ही है | दूसरी तरफ पत्थर की मूर्तियाँ बना कर उसे ही भगवान् मान कर पूजते हैं | […]

  2. […] गिर पड़ा | उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वह हारा या जीता | अब इस बात का निर्णय आप सब के ही हाथ मैं है कि हार हुई […]

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