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Sukh dukh ke jimmedaar hum khud- Karmo ka hisaab\fal\account

karmo ka hisaab

सुख दुःख मनुष्य के जीवन में श्रृष्टि का एक ऐसा चक्र है जो अनवरत घूमता रहता है | हर महुष्य को कभी सुख और कभी दुःख की अनुभूति होती रहती है जैसे रात के बाद दिन , दिन के बाद रात , जनम के बाद मृत्यु और मृत्यु के बाद फिर से जीवन | इसी प्रकार सुख और दुःख आते जाते रहते है |यह चक्र चलता रहता है | लेकिन अब मन में यह सवाल उठता है कि सुख और दुःख जीवन में क्यूँ आते हैं |किसीको सुख और किसीको दुःख क्यूँ सहन करना पड़ता है | इस सवाल के जड़ तक जाने पर यह पता चलता है कि अपने सुख और दुःख के जिम्मेदार हम स्वयं है |सुख और दुःख कर्म के सिद्धांत पर निर्भर है |हम जैसा कर्म करते हैं वैसा ही फल पाते हैं | अच्छे कर्म करने पर सुख भोगते हैं तो बुरे कर्म करने पर दुःख उठाते हैं | जो जैसा करता है उसे वैसा ही भरना पड़ता है |ache karm karna seekho

जिस प्रकार खेत में बीज डालने पर अनाज उगता है , उसी प्रकार हम जैसे कर्म रुपी बीज बोते हैं वैसा ही फल हमे मिल जाता है | अगर कोई बबूल का बीज बोयेगा तो बबूल ही उगेगा और अगर कोई आम का बीज बोयेगा तो आम ही पायेगा | कबीरदासजी ने भी कहा है ” बोया पेड़ बाबूल का तो आम कहाँ से पायें ?” इस प्रकार सुख और दुख हमारे ही कर्मो का परिणाम है | हम स्वयम ही इसके लिए जिम्मेदार है | सुख और दुःख हमारी भावना से जुड़े होते हैं | कठिन से कठिन और दुःख और असीम सुख के क्षणों में भी हम स्वयम को इन भावों से अलग रख सकते हैं | मान लीजिये हमपर दुःख का पहाड़ टूट पड़ा है या किसीका एकमात्र पुत्र भरी जवानी में ही मर गया है | ऐसे क्षणों में अगर हम ये सोचें कि दुःख तो सभी को आता है , किसीन न किसी रूप में सभी दुखी है | फिर हम पर ये दुःख पड गया तो क्या हुआ ? या फिर ऐसा सोचे कि सुख और दुःख तो आते जाते रहते है | आज हमारे बुरे दिन है तो कल अच्छे भी आयेंगे और पुत्र के मरने पर सोचे कि दुनिया में जो आया है उसे एक दिन जाना ही पड़ेगा | जिसने जनम लिया है उसे मरना भी पड़ेगा | कोई समझ से कुछ पहले चला जाता है | तो कोई थोडा बाद में |

  • यह तो श्रृष्टि का अटल नियम है | यह हमारे बस के बहार की बात है | ऐसा सोचने पर हमारा दुःख बहुत कम हो जाता है और आगे चलकर हम दुःख की भावना से हम स्वयं को निर्लिप्त भी कर सकते हैं | इसी प्रकार असीम सुख के क्षणों में भी हम स्वयम को अलग रख सकते हैं | सुख और दुःख तो हमारी भावना में है | हमारी सोच और हमारी चिंतन में है | हम एक ही बात को अलग अलग ढंग से सोचकर सुखी और दुखी भी हो सकते है और स्वयं को इन दोनों से निर्लिप्त भी रख सकते है | हर एक बात में कुछ न कुछ अच्छा और कुछ न कुछ बुरा छिपा रहता है | यह तो अपना अपना देखने और सोचने का नजरिया है कि एक ही बात में अच्छाई ढूंडकर हम खुश होते हैं या बुराई ढूंडकर दुखी होते हैं | या फिर निर्विकार रहते हैं | इस तरह अपने सुख और दुःख के जिम्मेदार हम खुद ही है |
धन्यवाद ,
सुधा गोएल.

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