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Stubborn kids- how to treat them ? Learn tips for parenting

stubborn kids
आजकल सभी जगह दिखने में आता है कि बच्चे बहुत जिद्दी होने लगे हैं |सुन ने में आता है ” पेट में सीख के आते हैं , इन्हें कुछ सिखाने की जरूरत ही नहीं है “|| तो मैंने इस विषय पर बहुत विचार किया , अध्यन किया तो कुछ बातें सामने आई | मुझे जो समझ में आया वह आप सबके सामने रखना चाहती हूँ | यह बात तो शत प्रतीषद सही है कि जब बच्चा गर्भ मैं आता है तभी से उसके सिखने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है | पहले संयुक्त परिवार हुआ करते थे जहाँ बुजुर्ग दादी- नानी होने वाली माँ को क्या सही है क्या गलत सिखाती रहती थी | अच्छे विचार , अच्छी सोच रखो बेटा , ध्यान लगाओ तो बच्चे पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा | पर आज समय बदल गया है | दो चार लोगों तक परिवार सीमित रह गया है | माहोल और वातावरण का प्रभाव बच्चे पर पड़ता है | माँ के जीवन में व्यतीत घटनाओ का असर भी बच्चे पर पूर्ण रूप मैं से पड़ता है |

एक बार एक महिला रूटीन चेच्कुप के लिए डॉक्टर के पास गयी |अपने नंबर का इंतज़ार करते हुए मोबाइल पर समय व्यतीत कर रही थी | एक बुजुर्ग महिला पास ही बैठी बहुत देर से ये देख रही थी | उससे रहा नहीं गया वह बोली बीटा कुछ अच्चा देखो कुछ ज्ञान वर्धक कहानियां सुनो या भगवान् के भजन ही सुन लो बच्चे पर अच असर पड़ेगा अच्छे संस्कार आयेंगे | बच्चा जब गर्भ मैं आ जाता है तो माँ को चाहिए की सुबह सर्वप्रथम अच्छी चीजों को देखे बहार की प्रकृति में घुमे | फूल पौधों और हरियाली को देखें तो मन ख़ुशी से भर उठता है | अपने खान -पान पर ध्यान दे | एक अच्छे संस्कारी बच्चे को जन्म देने के लिए खुद पर ध्यान देना बहुत जरूरी है | लेकिन आज समय बदल गया है | आज की मा बहार नौकरी करने जाती है | उसके पास खुद पर ध्यान देने का समय नहीं होता | बहार की खाना खा लेती है | सात्विक भोजन जो घर में बना होता है पौष्टिक होता है | वो कहावत है ना ” जैसा खाए अन्न वैसा बने मन ” यही सब कारणों के वजह से आज के बच्चों में सेहेंनशीलता धीरज नहीं आ पाते क्यूंकि दौड़े भागते माहोल में ही उनका जन्म हो जाता है | फिर उनको पालने के लिए आया आ जाती है | आया कैसे संस्कार देगी वो तो सभी जान सकते हैं | पहले संयुक्त परिवार में परिवारजनो के हातो में बच्चा पलता बढ़ता था उसे प्रेम प्यार की भावना मिलती थी |उसे प्रेम भाव समझमे आता था | मिल जुल के कैसे रहते हैं यह समझ में आता था |गलत सही का फर्क समझाया जाता था | घर से बहार हमउम्र बच्चो के साथ खेल कूद कर बड़े हो जाते थे | आज ऐसा नहीं है | घर में ही बच्चों को रहकर समय व्यतीत करना पड़ता है | जो उनके लिए बहुत कठीण होता है | क्यूंकि कुछ भी छूने पर शैतानी करने पर दांत और मार खानी पड़ती है |हर बात के लिए टोका जाता है | ये मत करो वो मत करो तो बच्चा उग्र बन जाता है | उसका अपना मन मर जाता है | वो स्वयं नहीं सम्झ् पाता उसे करना क्या है |

अतिशय लाड प्यार भी बच्चे को जिद्दी बना देता है | हम समझ ही नहीं पाते की बच्चा हमारे लाड प्यार का गलत फायदा उठा रहा है | क्योंकि आज की महिला घर पर रहना ही नहीं चाहती और बच्चा जो मांगे रखता है उन्हें पूरा करके निकल जाती है | जब कभी हम बच्चे की अनुचित मांग को पूरा नहीं क्र पाते तब वह जीद में आकर कुछ भी गलत करता है | बच्चे के गलत व्यवहार को गलत शब्दों के इस्तेमाल करने को कभी भी बढ़ावा नहीं देना चाहिए | बच्चे की हर जरूरत को हमे पहले खुद समझना चाहिये | उसे उस लायक बनाना चाहिए की वो भी उचित अनुचित में फर्क करना सीखे | क्या उचित है , क्या अनुचित है बच्चे को बताते रहना चाहिए | इन सब के लिए बच्चों को वक्त देना बहुत जरूरी है | जब तक बच्चा स्वयं समझदार नहीं हो जाता तब तक उसके साथ हमे कदम से कदम मिलाकर चलना है | क्युओंकी आगे चलकर यही बच्चे हमारा और देश का नाम रोशन करते हैं | समाज में अपनी कीर्ति बढ़ाते है और एक अच्छे नागरिक के रूप में अपना नाम जग में रोशन करते हैं |

धन्यवाद

मंजू मधोगारिया

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